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राहुल देव ने बेहद कम समय में साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है। संपादन और आलोचना के उनके अपने मानक हैं। वे हिंदी साहित्य के गहन अध्येता हैं। एक स्वतंत्रचेता कवि के रूप में ‘उधेड़बुन’ (2014) और ‘हम रच रहे हैं’ (2017) उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और पर्याप्त रूप से चर्चा में रहे हैं। उनका एक कहानी संग्रह ‘अनाहत एवं अन्य कहानियाँ’ (2015) भी प्रकाशित हो चुका है । पिछले वर्ष आई उनकी आलोचना पुस्तक ‘हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य’ अपनी तरह का एक अलग मौलिक काम है। एक कुशल सम्पादक के रूप में उनकी पुस्तकें ‘समकालीन व्यंग्यकार : आलोचना का आईना’ (2017) तथा ‘चयन और चिंतन : व्यंग्य के संग’ (2017) हैं। इसके साथ ही वह साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ के संपादन से सम्बद्ध रहते हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी त्रैमासिक पत्रिका ‘इंदु संचेतना’ में उपसंपादक भी हैं। इन सबके साथ वह अपनी ब्लॉग-पत्रिका ‘स्पर्श’ का संचालन भी करते हैं।

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Rahul dev

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राहुल देव ने बेहद कम समय में साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है। संपादन और आलोचना के उनके अपने मानक हैं। वे हिंदी साहित्य के गहन अध्येता हैं। एक स्वतंत्रचेता कवि के रूप में ‘उधेड़बुन’ (2014) और ‘हम रच रहे हैं’ (2017) उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और पर्याप्त रूप से चर्चा में रहे हैं। उनका एक कहानी संग्रह ‘अनाहत एवं अन्य कहानियाँ’ (2015) भी प्रकाशित हो चुका है । पिछले वर्ष आई उनकी आलोचना पुस्तक ‘हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य’ अपनी तरह का एक अलग मौलिक काम है। एक कुशल सम्पादक के रूप में उनकी पुस्तकें ‘समकालीन व्यंग्यकार : आलोचना का आईना’ (2017) तथा ‘चयन और चिंतन : व्यंग्य के संग’ (2017) हैं। इसके साथ ही वह साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ के संपादन से सम्बद्ध रहते हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी त्रैमासिक पत्रिका ‘इंदु संचेतना’ में उपसंपादक भी हैं। इन सबके साथ वह अपनी ब्लॉग-पत्रिका ‘स्पर्श’ का संचालन भी करते हैं।

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