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बिहार के मधेपुरा जिला में एक मध्यमवर्गीय किसान के घर जन्मे प्रभात रंजन ने धूल-धुसरित पृष्ठभूमि से अपनी जीवन-यात्रा शुरू की। पिताजी की महत्वाकांक्षाओं ने इन्हें आंशिक साक्षरता दर व दयनीय जीवन-शैली वाली बस्ती से निकाल कर बोर्डिंग पहुँचाया। इन्होंने विज्ञान से स्नातक की डिग्री तो हासिल की, मगर साहित्य-प्रेम और लेखन-प्रवृत्ति ने इन्हें कभी साहित्य से अलग न होने दिया। 1993 में प्रकाशित इनके पहले उपन्यास ‘दोस्ती और प्यार’ ने इन्हें व्यावसायिक लेखन के कई अवसर प्रदान किये। इनके कई टेलीफिल्म्स व धारावाहिक विभिन्न चैनलों से प्रसारित हो चुके हैं। प्रभात रंजन, बतौर फिल्म-पत्रकार नवभारत टाइम्स, अमर उजाला सहित कई समाचार पत्र समूह के लिये लिखते रहे, मगर पुस्तक-लेखन का मोह त्याग न सके। शायद इसीलिये, बीच-बीच में समय निकाल कर इन्होंने ‘एक नई प्रेमकहानी’, ‘सितारों के पार : गुलशन कुमार’, ‘कोशी पीड़ित की डायरी’ पुस्तकें लिखीं, जो विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित हुर्इं।

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Prabhat Ranjan

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बिहार के मधेपुरा जिला में एक मध्यमवर्गीय किसान के घर जन्मे प्रभात रंजन ने धूल-धुसरित पृष्ठभूमि से अपनी जीवन-यात्रा शुरू की। पिताजी की महत्वाकांक्षाओं ने इन्हें आंशिक साक्षरता दर व दयनीय जीवन-शैली वाली बस्ती से निकाल कर बोर्डिंग पहुँचाया। इन्होंने विज्ञान से स्नातक की डिग्री तो हासिल की, मगर साहित्य-प्रेम और लेखन-प्रवृत्ति ने इन्हें कभी साहित्य से अलग न होने दिया। 1993 में प्रकाशित इनके पहले उपन्यास ‘दोस्ती और प्यार’ ने इन्हें व्यावसायिक लेखन के कई अवसर प्रदान किये। इनके कई टेलीफिल्म्स व धारावाहिक विभिन्न चैनलों से प्रसारित हो चुके हैं। प्रभात रंजन, बतौर फिल्म-पत्रकार नवभारत टाइम्स, अमर उजाला सहित कई समाचार पत्र समूह के लिये लिखते रहे, मगर पुस्तक-लेखन का मोह त्याग न सके। शायद इसीलिये, बीच-बीच में समय निकाल कर इन्होंने ‘एक नई प्रेमकहानी’, ‘सितारों के पार : गुलशन कुमार’, ‘कोशी पीड़ित की डायरी’ पुस्तकें लिखीं, जो विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित हुर्इं।

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