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“मेरा जन्म 3 नवम्बर 1987 को उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा भी बदायूँ शहर में ही हुई। पिता जी रेलवे विभाग में कार्यरत थे तो उसी तरह मध्यम वर्गीय जीवन भी रहा। होश सम्भालते ही जैसा की मध्यम वर्गीय परिवारों के सपने होते हैं ‘मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा’ ने तकनीकी शिक्षा की ओर मोड़ दिया जिसके लिए मैंने कैमिकल ट्रेड से डिप्लोमा फिर कैमिकल से ही ग्रेजुएशन (AMIE) किया और इंडियन ऑयल, हल्दिया रिफाइनरी में उत्पादन विभाग में कार्यभार सम्भाल लिया। किन्तु बदायूँ जहाँ की मिट्टी साहित्य के लिए सदैव उर्वरक साबित हुई है जहाँ राष्ट्रीय कवि डा0 विजेन्द्र अवस्थी, शकील बदायूँनी, डा0 उर्मिलेश शंखधार जी जैसी कितनी ही शख्शियतों ने जन्म लिया तो उस मिट्टी की महक से ग़ज़ल ना जाने कब मेरे मन में बैठ गयी और मैं बचपन से ही कभी-कभी शे’र कहने लगा था। लेकिन मेरे भीतर के शाइर को भी काम के बोझ और व्यक्तिगत उलझनों ने लगभग गहरी नींद में सुला दिया था । पर नौकरी के कुछ दिन बाद ही इंडियन ऑयल के राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलनों और लोगों की मिलती मुहब्बत ने मेरे अन्दर के शाइर को वापस जगा दिया। जिसका परिणाम यह ग़ज़ल संग्रह आपके हाथ में है और इसे आप तक पहुँचाने के लिए हार्दिक शुक्रिया भाई वीनस केसरी जी के अंजुमन प्रकाशन परिवार का

मनु बदायूँनी?”

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Manu Badayuni

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“मेरा जन्म 3 नवम्बर 1987 को उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा भी बदायूँ शहर में ही हुई। पिता जी रेलवे विभाग में कार्यरत थे तो उसी तरह मध्यम वर्गीय जीवन भी रहा। होश सम्भालते ही जैसा की मध्यम वर्गीय परिवारों के सपने होते हैं ‘मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा’ ने तकनीकी शिक्षा की ओर मोड़ दिया जिसके लिए मैंने कैमिकल ट्रेड से डिप्लोमा फिर कैमिकल से ही ग्रेजुएशन (AMIE) किया और इंडियन ऑयल, हल्दिया रिफाइनरी में उत्पादन विभाग में कार्यभार सम्भाल लिया। किन्तु बदायूँ जहाँ की मिट्टी साहित्य के लिए सदैव उर्वरक साबित हुई है जहाँ राष्ट्रीय कवि डा0 विजेन्द्र अवस्थी, शकील बदायूँनी, डा0 उर्मिलेश शंखधार जी जैसी कितनी ही शख्शियतों ने जन्म लिया तो उस मिट्टी की महक से ग़ज़ल ना जाने कब मेरे मन में बैठ गयी और मैं बचपन से ही कभी-कभी शे’र कहने लगा था। लेकिन मेरे भीतर के शाइर को भी काम के बोझ और व्यक्तिगत उलझनों ने लगभग गहरी नींद में सुला दिया था । पर नौकरी के कुछ दिन बाद ही इंडियन ऑयल के राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलनों और लोगों की मिलती मुहब्बत ने मेरे अन्दर के शाइर को वापस जगा दिया। जिसका परिणाम यह ग़ज़ल संग्रह आपके हाथ में है और इसे आप तक पहुँचाने के लिए हार्दिक शुक्रिया भाई वीनस केसरी जी के अंजुमन प्रकाशन परिवार का

मनु बदायूँनी?”

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